मंगल पांडे: वो चिंगारी जो बन गई क्रांति की मशाल!
मंगल पांडे: The Real Boss 29 मार्च 1857—वो दिन जब हिंदुस्तान की धरती पर एक ऐसा सूरज उगा, जिसने अंग्रेजों की नींद हराम कर दी। नाम था मंगल पांडे—एक ऐसा शेर, जिसने बैरकपुर की छावनी में विद्रोह का बिगुल फूंका और आजादी की पहली गोली दागी। ये कोई फिल्मी हीरो नहीं था, भाई, ये था असली हिंदुस्तानी जांबाज, जिसके खून में देशभक्ति और आँखों में आग थी। तो चलो, और देखते हैं कि मंगल पांडे का परिवार और आज का उनका जज्बा हमें क्या सिखाता है! 1857 का वो धमाका बैरकपुर छावनी। मंगल पांडे, 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री का वो सिपाही, जिसके सामने अंग्रेजों की चालाकी धरी की धरी रह गई। नई एनफील्ड राइफल्स आईं, जिनके कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी की अफवाह फैली। ये बात हिंदू-मुस्लिम सिपाहियों के लिए आस्था पर चोट थी। अंग्रेज सोचते थे, "इनको डराकर रखेंगे," मगर मंगल पांडे ने कहा, "अब खेल खत्म!" उसने बंदूक उठाई, गोलियाँ दागीं, और लेफ्टिनेंट बफ और सार्जेंट-मेजर ह्यूसन को धराशायी कर दिया। "भाइयों, उठो, फिरंगियों को मारो!"—उसकी वो हुंकार गूंजी, और भले ही उस दिन साथी हिचकिचाए, मगर वो चिंगारी ...